@आशीष बागड़ी
Political Report (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) देवली-उनियारा विधानसभा क्षेत्र में 13 नवम्बर को होने वाले उपचुनाव में अब मुकाबला त्रिकोणीय बनता जा रहा है या बनाया जा रहा है, ये सवाल तत्समय बड़ा दिलचस्प हो गया है। बीजेपी अतिआत्मविश्वास में जीत का दावा भर रही है और कांग्रेस कांग्रेस के बागी नरेश मीणा को बड़ा खिलाड़ी मान रही है।
बीजेपी का बहुचर्चित नारा” कटेंगे तो बटेंगे” अब कांग्रेस के लिए एक राजनीतिक व मीणा वोटो के लिए सामाजिक हथियार बन गया है। हालात जो कुछ भी हो बुधवार रात देवली के छतरी चौराहे पर हुई कांग्रेस की चुनावी सभा मे जो कुछ बड़े वक्ताओं से सुनने को मिला, उससे तो साफ जाहिर है कि उपचुनाव में मुकाबला अब सम्भवतः त्रिकोणीय बनता लग रहा है। नरेश मीणा की सभाओं में उमड़ रही भारी भीड़ ने कांग्रेस की चिंता तो जरूर बढ़ा दी है। ये सवाल दीगर है कि नरेश मीणा निर्दलीय की हैसियत से कितने वोट ले पाएंगे या मुख्य मुकाबले में लौट आएंगे ये देखना अब दिलचस्प होगा। लेकिन बीती रात कांग्रेस दिग्गजों शान्ति धारीवाल, रघु शर्मा, कर्ण सिंह, हरिमोहन शर्मा समेत नेताओ ने बीजेपी प्रत्याशी राजेन्द्र गुर्जर को निशाना बनाने के बजाय न केवल राज्य सरकार को घेरा, बल्कि उन्होंने नरेश मीणा का नाम लेकर जनता को साफ सन्देश दे दिया कि देवली- उनियारा में नरेश मीणा को वोट देने का मतलब है बीजेपी के जाल में फंसना।
इशारों में कह दिया बीजेपी ने बिछाया जाल
सभी बड़े नेताओं ने कही नरेश मीणा का नाम लिया तो कइयों ने साफ इशारों में कह दिया कि ये जाल बीजेपी का बिछाया है। एक तरफ कांग्रेसी नेताओं ने बीजेपी के बहुचर्चित नारे ” कटेंगे तो बटेंगे” को देश विरोधी बताया तो भाषणों में ये भी स्वीकार किया कि क्षेत्र के मतदाताओं को वोट कटने से बचना चाहिए। वक्ताओं ने साफ कहा कि नरेश मीणा को बीजेपी ने एक साजिश के तहत खड़ा किया है, जिससे कि मीणा वोटों में विभाजन हो जाए। कांग्रेसी नेताओं के भाषणों में जो चिंता झलक रही है, वह इस बात की पुष्टि करती है कि नरेश मीणा कांग्रेस प्रत्याशी केसी मीणा के लिए कड़ी चुनौती बन चुके है और इसका फायदा बीजेपी प्रत्याशी को मिलना संभव है। यहीं बड़ी चिंता कांग्रेस की है। उक्त स्वीकारोक्ति से बीजेपी आत्मविश्वास से लबरेज है। लेकिन असल मे इसका धरातल पर कितना असर होगा ये 10 नवम्बर से दिखना शुरू होगा। ये माना जाता रहा है मतदान से पूर्व के तीन दिन बड़े महत्वपूर्ण होते है।
जब मतदाता अपना मानस तय करता है। यद्दपि ये कहना सही होगा कि चुनावी मैनेजमेंट में बीजेपी अव्वल चल रही है। माइक्रो मैनेजमेंट के तहत जातिगत समीकरणों के हिसाब से विधायक, मंत्रियों की लंबी फ़ौज मैदान में उतार दी है। ये काम पिछले 5 दिनों से युद्ध स्तर पर चल रहा है। आखरी दिनों में बीजेपी जातिगत समीकरणों के हिसाब से प्रभारी बनाकर गांवों, शहरों में नेताओं के डेरे लगाने जा रही है, ऐसे में ये कहना सही है कि बीजेपी पूरी रणनीति से उपचुनाव लड़ रही है। लेकिन बीजेपी में भी सब कुछ सही नही लग रहा है। कहीं नाराजगी है तो कहीं असंतोष है। सिरफुटौव्वल की हालत भी है। उक्त हालातों के बावजूद बीजेपी जीत के प्रति पूरी तरह आत्मविश्वास से लबरेज है। दूसरी और कांग्रेस में मंगलवार से क्षेत्रीय सांसद हरीश मीना की और से कमान संभालने के बाद चुनाव प्रचार में सक्रियता आई है।

सक्रियता व निष्क्रियता के भी कई मायने
लेकिन सचिन पायलट के सक्रिय नही होने से फिलहाल कोई बड़ा इशारा नजर नही आ रहा है। विजय बैंसला के निष्क्रिय रहने का असर दिख रहा है। कांग्रेस पूरी तरह मीणा, एससी, मुस्लिम व परम्परागत वोटों के सहारे है। जबकि बीजेपी गुर्जर, ओबीसी, राजपूत, धाकड़, माली,जनरल मतदाताओं के भरोसे है। नरेश मीणा की चुनावी सभाओं में जो मुद्दे उठा रहे है वे लोगो को आकर्षित करते है।धाराप्रवाह भाषण के बीच बड़े नेताओं पर खुलकर आरोप लगाने की शैली का कितना असर मतदाताओं पर पड़ता है ये तो चुनाव परिणाम बताएंगे। लेकिन इतना तय है कि नरेश मीणा के साथ युवा वर्ग लगा हुआ है। करीब 21 से 35 वर्ष आयुवर्ग के युवा मतदाताओं की संख्या करीब 34 हजार के आसपास है। जो चुनाव परिणाम को बदल देने की क्षमता रखते है। देवोत्थान एकादशी से शुरू हो रहे ब्याह-सावों की भरमार, खेती- किसानी में व्यस्त किसान वर्ग के अलावा व्यापारियों की व्यस्तता भी मतदान को प्रभावित करेगी।
ऐसे में मतदान प्रतिशत हार-जीत का बड़ा कारण बन सकता है। इस उपचुनाव में सामान्य वर्ग के मतदाताओं में ज्यादा उत्साह नही है। वहीं कांग्रेस के स्थानीय उम्मीदवार उतारने से चुनाव बहुत रोचक व दिलचस्प हो गया है।


